Saturday 20 April 2024 7:07 AM
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शादी दो दिलों, दो शरीर और दो परिवारों का पवित्र मिलन व बिखराव की दुखदायी स्थिति

दिल्लीसमाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) l  शादी दो दिलों, दो शरीर और दो परिवारों का मिलन है । इस पवित्र मिलन के बंधन में मूल आधार विश्वास और प्रेम होता है l उसमें परिवर्तन नहीं होता है । पवित्र मिलन के बंधन के रिश्तो में एक दूसरे का ख्याल रखना और दया दिखाना, समर्पण-सहनशीलता और त्याग आवश्यक अंग होता है । विवाह के गणित में एक और एक मिलकर एक होता है । विवाह सिर्फ दो दिलों का मेल नहीं दो परिवारों का मेल होता है लेकिन आमतौर पर लोग शादी के बाद ये बातें भूल जाते हैं । वे जीवनसाथी के अनुरूप खुद को बदलने की अपेक्षा उसे बदलना चाहते हैं । पूरा परिवार नए सदस्य के अनुरूप अपनी एक भी आदत बदलना नहीं चाहता ।

रिश्तो में परिवर्तन होना एक स्वाभाविक फंक्शन है । संसार में कोई भी चीज परमात्मा के अलावा स्थिर नहीं है । सभी चीजें परिवर्तनशील है, इस तथ्य को हमें अपने मन में तथा बुद्धि में बिल्कुल स्पष्ट रखना चाहिए । आप अपना ही व्यक्तित्व ले लीजिए । आप बच्चे थे तो आपके रिश्ते अपने जन्म से संबंधित मां-बाप, रिश्तेदारों और सब बड़ों से अलग होते थे । जब आप बड़े हुए तो आपके रिश्ते दोस्तों से अलग, पत्नी से अलग, और मां-बाप से भी बदल जाते हैं । अब आप के वयस्क होने पर मां बाप के लिए छोटे नहीं रहते और आप मां-बाप से स्वतंत्र होने के कारण आपके रिश्तो में व्यवहार में थोड़ा परिवर्तन आता है ।

माँ बाप अपने बच्चो की शादी क्यों करते हैं? क्योंकि सामाजिक व्यवस्था बनी रहती है । संसार बूढा होने से बचा रहता है । सब को समान भाव हर किसी का सम्मान करना आ जाता है । एक पुरुष को एक स्त्री या एक स्त्री को एक पुरुष के रूप में जीवन साथी मिल जाता है जो एक दूसरे के सुख दुख में जीवल पर्यन्त साथ रहता है । शादी व्यवस्था बुरी नहीं है ।

कुछ साल पहले तक जब लड़का और लड़की 15 या 16 साल के हो जाते थे तो परिवार और रिश्तेदारों द्वारा उनकी मंगनी या सगाई की रस्म कर दी जाती थी और उनको कहा जाता था कि आज से यही तुम्हारा जीवन साथी है, ऐसा करने से उन दोनों युवाओं का मन इधर उधर भटकने के बजाय बिन देखे एक दूसरे से जुड़ जाता था और जब 3 साल बाद उनकी शादी की जाती थी l तब 4-5 साल एक दुसरे को ठीक से समझने में लग जाते थे l परिवारिक अच्छी बुरी परिस्थितियों के जरिए अच्छे से जान लेते थे, समझ लेते थे l फिर जब मोह किसी से मन से जुड़ जाता है तो कुछ भी हो जाए उसे हटा पाना असम्भव सा होता है ।

पहले के समय में जब शादियां होती तो स्त्रियां बहुत हद तक अपने पति पर निर्भर रहती थी और उपयुक्त वर ना मिलने पर चाह कर भी पति पर निर्भर होने के कारण अलग नहीं हो पाती थी । दूसरी बात पहले के लोग अधिक संस्कारिक होते थे बड़े बुजुर्गों व रिश्तेदारों का सम्मान करते थे इस वजह से भी पति पत्नी का रिश्ता मजबूत रहता था । उस वक़्त औरत मजबूर थी । ससुराल छोड़कर जीवन यापन हेतु उसके पास कोई घर कोई ठौर ठिकाना नहीं था । माँ बाप का घर भी पराया हो जाता था । रिश्ता टूटना या तलाक होना एक सामाजिक और पारिवारिक नासूर का रोग माना जाता था l पहले विदाई के बाद ससुराल से लड़ झगड़ कर लड़की का मायके वापस आना अच्छा नहीं समझा जाता था, रिश्ते निभाने की विवशता थी l

वर्तमान समय में शादी का पवित्र रिश्ता लंबे समय तक चलना काफी कठिन हो गया है, क्योंकि लड़कियाँ अब शिक्षित होकर अपने पांव पर खड़ी होने लगी हैं उनकी निर्भरता पति पर धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं l जिसके कारण प्रत्येक लड़का या लड़की अपने जीवन में अधिक स्वतंत्र रहना चाहते है l दूसरा लोगों में पहले जैसे संस्कार भी नहीं है जो अपने बड़े बुजुर्गों या रिश्तेदारों के दबाव के आगे झुक सकें वे अपने रिश्तेदारों में बड़े बुजुर्गों की परवाह ना करते हुए अलग रहना चाहते हैं । अब डर नहीं है । आज पत्नियां पति का लिहाज नहीं करती, बहुएं सास ससुर का लिहाज नहीं करती तथा जेठ जेठानी का लिहाज नहीं करती l दूसरी ओर पति भी पत्नी को जिस नजर से देखना चाहिए, उस नजर से पति भी नहीं देख रहा है, पति को चाहिए अपने पत्नी को स्नेह देना प्यार देना । पत्नी की भावनाओं को समझना व आदर करना । आज मोबाइल का जमाना है लोग अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त हैं कोई किसी के पास बैठने का समय ही नहीं है ।

आजकल विवाह के रिश्ते में चट मंगनी पट ब्याह वाला मामला है किसी अनजाने के साथ एकाएक आपको रहने के लिए कहा जाए तो मतभेद हजार होंगे आपकी और उनकी सोच में फर्क होगा और आप जिंदगी में आजादी महसूस नहीं कर पाएंगे ओर उस रिश्ते से बाहर निकलना चाहेंगे । बाद में उन दो दिलों के अपने अपने व्यक्तिगत विचार एवम् सामाजिक रहन सहन में भेद यदि उबरे तो पति-पत्नी में ईर्षा की भावनाए शुरु होते हैं ।

शादी का पवित्र बंधन टूटने का सबसे बडा कारण होता है झूठा ईगो या आपसी नासमझी । अंह का दंश उनको डस लेता है । समझदार अपनी समस्या को सुलझा लेते हैं नासमझ जरा सी उलझन को और उलझा लेते हैं । कभी कभी रिश्तेदार करीबी लोग तमाशबीन बनकर तमाशा देखते हैं । दूसरा एक दूसरे की बातों को पकड़कर बैठ जाना, तीसरा दाम्पत्य जीवन में किसी तीसरे को बोलने का अवसर देना । चौथा तुम छोटे तो हम बडा । पांचवां रिलेसन में बेवजह चालाकी या झूठ को घुसाना । छठा कुछ लोग चाहकर भी कभी घर नहीं बसा सकते हैं । उसके पीछे बेवजह शादी का बंधन बांधकर अपना जीवन बर्बाद नहीं करना चाहिये ।

पति-पत्नी लगभग हर चीज में समान हैं इसलिए वे एक दूसरे का आधिपत्य स्वीकार करने में असहज महसूस करते हैं इसलिए वर्तमान समय में शादी का पवित्र रिश्ता लंबे समय तक चलना काफी कठिन हो गया है ।

जीवन जीना एक कला है । शादी के लिए अच्छा कारोबार और नौकरी के साथ साथ समझदारी, वफादारी, ईमानदारी, न्यायप्रियता, सकारात्मक सोच, सहयोगी स्वभाव और एक दूसरे को थोड़ा स्पेस देना भी अनिवार्य है । वक्त को पहचाने, समझदार बने, वैवाहिक सुखद जीवन के मार्ग में आने वाली बाधाएं स्वत: समाप्त हो जाएंगी ।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए समाजहित एक्सप्रेस उत्तरदायी नहीं है।

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