Wednesday 19 June 2024 7:08 AM
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सामाजिक एकता की टकसाल से प्रतिभावान विभूति पैदा होते हैं  

दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) l समाज व्यक्ति को गढ़ने की टकसाल है, और समाज की टकसाल से प्रतिभावान विभूति पैदा होते हैं l ये प्रतिभावान प्रदीप्त दीपक के सामान होते हैं तथा जहाँ भी होते हैं, अंधकार को दूर भगाते है और प्रकाश बिखेरते हैं l सामाजिक व्यवस्था के आधार पर किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है और श्रेष्ठ व्यक्ति समाज को उन्नत एवं समृद्ध बनाते है l सामाजिक मुल्य एवं आदर्श इन्हीं व्यक्तित्व संपन्न महान व्यक्तियों के माध्यम से समाज में सुरक्षित रहते हैं l

वर्तमान में समाज रूग्ण एवं जर्जर हो चुका है, आज विडम्बना ही है कि जिस व्यवस्था से समाज को बल मिलता था, जिसके आलोक से समाज आलोकित होता था, आज वही समाज ग्रुप्स में बंटकर बिखर रहा है l आज समाज अनेक वर्गों में विभाजित हो गया है l विभाजन की यह दरार इतनी चौड़ी होती जा रही है l सामाजिक मुल्य, नीति, आदर्श एवं परम्पराएं बीते दिनों की बातें बन गई है l इसके लिए समाज एवं व्यक्ति दोनों ही बराबर के जिम्मेदार है l

अब इस विभाजन की दरार को केवल संवेदनशीलता ही रोक सकती है l आज हमारे समाज की सबसे ज्वलंत समस्याएं है तलाक, बुजुर्गो का उपेक्षा, अपनों से दूरियां, युवा पीढ़ी का गुमराह होना l प्रेम सबकुछ सह लेता है पर उपेक्षा नहीं सह सकता l

आज इस बदलाव की बयार को समय रहते रोका नहीं गया तो यह आंधी बन कर के पुरे समाज को जला देगी l “घर को लगा दी आग घर के चिरागो ने” यह कहकर दूसरों के ऊपर तरस खाने की जगह समाज के लोगों को आगे बढ़कर इस धर्मयुद्ध में भागीदारी निभानी पड़ेगी अन्यथा आने वाला समय हमें माफ नहीं करेगा, आग की चिनगारी को फैलने से पहले ही बुझा देना उचित है l

प्राय: पुरानी और नई पीढ़ियों का संघर्ष नूतन और पुरातन का संघर्ष है, जो थोड़ी बहुत मात्रा में सदैव रहता है, किन्तु वर्तमान युग में अचानक भारी परिवर्तन हो जाने के कारण टकराव की परिस्थितियाँ अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली बन गई है, जिसमें संघर्ष को और अधिक बल मिला है l युवा जीने की क्षमता तो रखता है, लेकिन अनुभव नहीं रखता l बुजुर्ग अनुभव रखता है, लेकिन जीने की क्षमता खो गई होती है, ऊर्जा खो गई होती है l जरुरत है कि दोनों मिल जाएँ l जंगल में आग लगी हो, और अंधे और लंगड़े आपस में नहीं मिले तो दोनों को खतरा भारी है l

 कोई भी समाज समृद्ध नहीं हो सकता अगर इसके सदस्य स्वार्थी या ऐसे दोष वाले होंगे जो सहनशीलता की सीमा से बाहर हों । ऐसे समाज को केवल परिवर्तन की आंधी ही बदल सकती है ।

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