Wednesday 12 June 2024 7:57 PM
Samajhitexpressआर्टिकल

आप कुंए का मेंढक नहीं बने, अन्धविश्वास को त्यागे, स्वतंत्र होकर खुले वातावरण में सुखी जीवन जियें 

दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) l  एक कुएं में बहुत सारे मेंढक रहा करते थे। उन मेंढकों का एक राजा भी था। एक दिन कुए के सभी मेंढकों को राजा ने बताया कि यदि आप में से इस कुएं में से कोई भी मेंढक बाहर जाएगा तो उसकी मौत हो जाएगी। हम मेंढकों के लिए बाहर की दुनिया सही नहीं है।

कुएँ में पैदा हुए मेढक को दूसरे मेढक हमेशा राजा की बताई बात को आदर्श शिक्षा (उपदेश) मानते हुए यही शिक्षा देते रहते थे कि कुएँ से बाहर मत निकलना अन्यथा मारे जाओगे या कुछ अनर्थ हो जावेगा। क्योंकि बाहर मृत्यु है। उसे बचपन से बुढ़ापे तक बस यही सिखाये जाने से उसका बौद्धिक विकास क्षीण हो जाता है और वह उन शातिरों से तर्क करने से घबराता हुआ जीवन यापन करता है l  एक मेढ़क ने हिम्मत कर पूछा भाई बताओ तो सही बाहर ऐसा कौनसा खतरा है, जिससे मौत हो सकती है । इस भय के कारण अधिकांश मेढक अपना पूरा जीवन कुएं में ही गुजार देते है । धारणा प्रबल होने पर प्राणी की सोचने समझने की शक्ति पर हावी हो जाती हैं और वे सदैव सोचते रहते हैं कि बाहर नहीं जाना चाहिए कहीं हमारे साथ अनहोनी घटना घटित न हो जावें ।

कुछ अंतराल बाद किन्तु कुछ मेंढकों ने आपसी मन्त्रणा की और सोचा एवं तर्क करने का साहस कर यह  जानने की कोशिश की कि बाहर जाने से कोई मर कैसे जायेगा और उन्होंने हिम्मत कर कुएँ से बाहर छलांग लगा ली। बाहर आये तो ताजा हवा थी, रोशनी थी, फूलों की सुगंध थी कुछ खाने को भी मिला और अपने जैसे और भी मेंढक थे । उन्होंने महसूस किया कि कुएँ के अन्दर जो हमें सदियों से बताया जा रहा था वो सब हमें दबाये रखने की एक साजिश थी । कुएँ में जिन मेढकों का राज है, वो हमेशा से ये चाहते हैं, कि कोई उनकी गुलामी से दूर न भागे, वे उन्हें डराकर गुलाम बनाये रखना चाहते हैं, लेकिन जो मेंढक गुलामी से ज्यादा ही तंग थे और तर्क वितर्क करने का जज्बा रखते थे स्वाभिमानी ओर निडर थे वो कुएँ से बाहर निकल आये और आनंदमयी जीवन जीने लगे ।

प्रत्येक समाज के पिछड़ने का यही एक मुख्य कारण रहा है कि हमारे लोगो के आस्था के नाम पर गुलामी, अंधविश्वास और पाखण्ड में डूबे पीढ़ियां गुजर गयी पर कभी उन परिपाटियों, कुरीतियों, अंधविश्वास, अंधभक्ति और पाखण्ड के पीछे के क्या कारण हैं इस तर्क को जानने की कभी कोशिश ही नहीं की गई और शातिर नेतृत्व की हां में हां मिलाते आ रहे हैं, और आज भी ठगे जा रहे हैं । इसीलिए तो विवेकहीन, अज्ञानी लोगों को “कूप मंडूक” की संज्ञा दी गई है ।

आइए तथागत बुद्ध की प्रेरणा और बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर की विचार धारा ओर महापुरुषों की के बताए गए सिद्धान्तों को अंगीकार कर समाज के लिए कुछ रचनात्मक सेवा कार्य करें जिससे सृजनात्मक वातावरण तैयार हो जिसमें आमजन सन्तोष ओर शकुन का जीवन यापन करें। आत्म निर्भर बन सके ।

समाज में धूर्त्त कुटिल ओर दगाबाज व्यक्तियों की गुलामी, चापलुची  करना महापुरुषों की विचार धारा के विपरीत हैं। अंधविश्वास और पाखण्ड को ठोकर मारकर दूषित मानसिकता ओर स्वार्थी, मौका परस्ती लोगों के चंगुल में पड़ना खतरे से खाली नहीं हैं।

बाबा साहब ने सवर्णों के शोषण एवं अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए बहुजनों को लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली का संविधान में प्रावधान करते हुए ऊपर उठने के लिए सुरक्षा कवच ओर मौलिक अधिकार प्रदान किये, लेकिन अफसोस इस बात का है कि अपने ही लोग अपनों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शोषण कर रहे हैं, उन्हें गुमराह करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। यह बहुत ही गम्भीर मामला हैं। जिसके दूरगामी परिणाम निराशाजनक होंगे। जो वर्तमान परिपेक्ष में विचारणीय बिंदु हैं। जिस पर समाज के प्रबुद्धजनों को चिंतन और मंथन करना चाहिए।

मानव जीवन में गुलामी करना महा मूर्खता हैं। चाहे अपनों की हो या अन्यों की इसलिए अपने जीवन को स्वतंत्र रूप से जीना सीखो । निडर बनो, साहसी बनो, कर्मठ बनो, सेवा भावी बनो, कर्तव्य निष्ठ बनो, देश भक्त बनो, परोपकारी बनो, जरूरत मंद का सहारा बनो, गरीब का सहारा बनो, स्वाभिमान का जीवन जिओ, सत्य पर अडिग रहो, शिक्षा को महत्व दो, प्राणी मात्र के कल्याण के बारे में सकारात्मक सोच रखना ही मानवीय गुण एवं संवेदनशीलता का बेहतरीन उदाहरण हैं।

व्यक्ति को जीवन में असत्य को स्थान देना मतलब समाज को पीछे धकेलना हैं। सामाजिक संगठनों में भी यह देखा गया हैं कि सीधे सादे लोगों को गुमराह किया जाता रहा हैं। जो अनैतिक कृत्य ही हैं। यह भी एक तरह का शोषण का हिस्सा हैं। इसलिए प्रबुद्धजनों ध्यान रहे कि अपने छोटे से व्यक्तिगत स्वार्थपूती हेतु प्राणी मात्र का अप्रिय करना तो दूर सोचना भी तथागत बुद्ध के सिद्धांतों के विपरीत हैं।

सत्य का अनुकरण करना सभी के लिए कल्याणकारी हैं। जबकि असत्य आचरण या बोलना हमारी संस्कृति सभ्यता और नैतिकता के विरुद्ध हैं। सत्य परेशान हो सकता हैं लेकिन पराजित नहीं हो सकता।

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