Wednesday 19 June 2024 7:26 AM
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क्या हम समाज की उन्नति-प्रगति के कार्यों के लिए एक-दूजे का साथ देते है? ये सवाल अपने आप से पूछे l

दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) l  रैगर समाजबंधू आर्थिक रूप से अन्य कई समाजों के मुकाबले संपन्न है अर्थात धनि है, धनवान है, ज्ञानी है, दानी है, बुद्धिमान है, चारित्र सम्पन्न है, सुस्वभावी है, शिक्षित (एज्युकेटेड) है, मिलनसार है,  ईमानदार है, व्यापार में होशियार है, मेहनती है फिर भी समाज दिन-ब-दिन पिछड़ता जा रहा है, अपनी पहचान को, अपने गौरव को खोता जा रहा है… क्यों???  क्योंकि एकता का आभाव है । समाज में एकता की कमी है । एकता से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है । एकता ही समाजोत्थान का आधार है । जो समाज संगठित होगा, एकता के सूत्र में बंधा होगा उसकी प्रगति को कोई रोक नहीं सकता किन्तु जहाँ एकता नहीं है वह समाज ना प्रगति कर सकता है, ना समृद्धि पा सकता है और ना अपने सम्मान को, अपने गौरव को कायम रख सकता है। रैगर समाज इसका जीता-जागता उदहारण है । हम समाजबंधु एकसाथ रहते तो है लेकिन क्या हम उन्नत्ति-प्रगति के लिए एक-दूजे का साथ देते है? नहीं ; तो सिर्फ एकसाथ रहने का कोई मतलब नहीं । एक साथ इस शब्द को कोई अर्थ तभी है जब हम एक साथ रहे भी और एक-दूजे का साथ दे भी । ऐसी एकता को ही सही मायने में ‘एकता’ (Unity) कहा जाता है ।

समाज में एकता को कायम रखने के लिए समाजशास्त्रियों ने ‘संगठन’ नामक एक व्यवस्था सूचित की और हर एक समाज ने इस व्यवस्था के महत्त्व को समझते हुए इसे अपनाया । रैगर समाज में भी संगठन बने हुए है । समाज के संगठन का पहला काम होता है की समाजबंधुओं में अपने धर्म या जाती के प्रति एक अस्मिता को, स्व-अस्मिता को, गर्व की अनुभूति को जागृत रखें । अपनी संस्कृति को समाजबंधुओं के जीवनशैली का एक अंग बनाकर अपनी संस्कृति का संरक्षण-संवर्धन करें । समाज की एकता के लिए यही सबसे पहली जरुरत है, पहली शर्त है । किसी मराठा को, राजपूत को, सिख को, अग्रवाल को, जैन को देखिये उन्हें अपने मराठा, राजपूत, सिख,  अग्रवाल, जैन होने पर गर्व होता है । अस्मिता और संस्कृति का यही मजबूत धागा समाज को एकता के सूत्र में बांधे रखता है । क्या आज रैगारो में अपने “रैगर” होने के प्रति वह अस्मिता, वह गर्व की अनुभूति जागृत है? 

रैगर संस्कृति के आन-बाण-शान के लिए, संरक्षण-संवर्धन के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगाने का जज्बा बचा है? क्या समाज के युवाओं को अपने “रैगर” होने पर नाज होता है? गर्व अनुभव होता है? यदि नहीं तो यह बात पत्थर की लकीर है की समाज में, समाज के नाम पर एकता बन ही नहीं सकती और ना ही संगठन बन सकता है । बिना इस स्व-अस्मिता के समाज का संगठन बन ही नहीं सकता और जैसे तैसे बन भी जाये या बना भी ले तो ना उस संगठन का समाज पर कोई प्रभाव रहता है और ना ही समाज के लोगों को संगठन से कोई लगाव रहता है । संगठन मात्र एक औपचारिकता भर बनके रह जाता है । ऐसी स्थिति में कोई नेतृत्व, कोई संगठन समाज में एकता कायम नहीं कर सकता । एकता के लिए “स्व-अस्मिता” यही बुनियादी जरुरत है । जैसे विवाह के लिए बुनियादी जरुरत  होती है- एक विवाहयोग्य लड़के की और लड़की की । बाकि सब जरूरतें… रिश्तेदार, यार-दोस्त, बाराती, पंडितजी, विवाह के अन्य इंतजाम आदि सब बाद की बात है ।

आज हम समाजबंधुओं खासकर युवाओं से ‘रैगर संस्कृति’ के बारे में उनकी जानकारी जानना चाहे तो वो कुछ बता नहीं पाते है । कई समाजबंधुओं से व्यक्तिगत बातचीत में जब हमने कहा की, चलो… रैगर संस्कृति/कल्चर के बारे में कोई ऐसी बात बताएं जिसे की समाज के सभी लोग कहे की हां, इस बात पर हम सभी एकमत है । बस ऐसी दो बातें ही कुछ समाजबंधु बता पाये- पगड़ी (साफा) और भोजन में दाल-बाटी-चूरमा । ऐसा नहीं है की रैगरों की कोई संस्कृति ही नहीं रही है या जीवनशैली में, दिनचर्या में उनका समावेश ही नहीं रहा है । किसी नामविशेष से कोई समाज होता है, जैसे की- जैन, अग्रवाल, राजपूत आदि ; तो उस समाज की अपनी संस्कृति भी होती ही है । बिना किसी संस्कृति के, बिना किसी ऐसी समान बातों या चीजों के जो की उस समाज के सभी लोग एकसमान रूप से करते है कोई समाज निर्माण ही नहीं होता, बन ही नहीं सकता । मित्रों, लगभग 2600 वर्ष पूर्व जब रैगर समाज की उत्पत्ति हुई थी, जब हमारे पूर्वज राजपूत से “रैगर” बने थे उस समय रैगर समाज के धार्मिक-आध्यात्मिक-सामाजिक प्रबंधन हेतु समाज-गुरु भी बने थे । समाज को दिशा देने का, मार्गदर्शन करने का कार्य एक व्यवस्था के रूप में समाज-गुरुओं को सौपा गया था । तत्थ्य बताते है की गुरुओं ने एक सुव्यवस्थित प्रणाली, एक व्यवस्था का निर्माण किया था जो रैगर उत्पत्ति के बाद हजार-बारासौ वर्षों तक सुचारू रूप से चला । आज हम में से ज्यादातर समाजबंधुओं को उस बारे में कुछ भी पता ही नहीं है ।

दुख के साथ कहना पड रहा है की समाज के संगठन इस “रैगर अस्मिता” को समाजबंधुओं में जागृत रख पाने में नाकामयाब रहे है । रैगर संस्कृति  के संरक्षण-संवर्धन करने के अपने दायित्व को निभाने में समाज के संगठन असफल रहे है । समाज के संगठन की इस नाकामयाबी का, लापरवाही का खामियाजा आज समाज को भुगतना पड़ रहा है । मित्रों, एकता के लिए आवश्यक यह कार्य कोई महीने दो महीने का अभियान नहीं होता है बल्कि ऐसे एक व्यवस्था के रूप में कार्य करता है जो एक प्रक्रिया की तरह निरंतर चलता रहता है । समाज के गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए, समाजबंधुओं की आर्थिक प्रगति हो जिससे की समाज समृद्ध हो इसलिए समाज में एकता होना जरुरी है और समाज में  एकता के लिए ऐसी एक स्थाई व्यवस्था का पुनर्निर्माण जरुरी हो गया है ।

समाज के संगठन का दूसरा मुख्य काम होता है की समाजबंधुओं के आर्थिक प्रगति के लिए संगठन सहयोगी के रूप में कार्य करें । इस कार्य हेतु उचित मार्गदर्शन समय-समयपर करता तो रहे ही बल्कि जहाँ आवश्यक हो वहां हर तरह से सहयोग भी करें । केवल इतना ही नहीं बल्कि समाजबंधुओं के आर्थिक हितों की रक्षा करनेका, समाजबंधुओं को एवं माता-बहनों को सामाजिक सुरक्षा देने का कार्य भी समाज के संगठन को करना होता है । ऐसा होता है तो ही समाजबंधुओं को संगठन की जरुरत और महत्त्व है और तभी वे संगठन से जुड़ते है । तब ही समाजबंधु या समाज, संगठन का कहा मानते है । संगठन के नेतृत्व को, पदाधिकारियों को सही मायने में सम्मान मिलता है, समाज पर उनका अधिकार चलता  है । समाज उनका अधिकार स्वीकार करता है । आज देशभर में, शहर, तहसील, जिला स्तर से लेकर राष्ट्रिय स्तर तक संगठन और पदाधिकारी बने हुए है । क्या संगठन और उनके पदाधिकारियों द्वारा यह सब कार्य होते है? यदि नहीं ; तो क्यों समाजबंधु संगठन से जुड़ेंगे? क्योंकर पदाधिकारियों की सुनी जाएगी? अच्छा इसमें पूरा दोष पदाधिकारियों का भी नहीं है । वे तो समाजकार्य करने के नेक जज्बे के साथ संगठन से जुड़ते है, जिम्मेदारियों को उठाने के लिए पदाधिकारी बनते है लेकिन संगठन ने ऐसी कोई व्यवस्था का निर्माण ही नहीं किया है की वह समाज के लिए कोई परिणामकारक कार्य कर सकें । शहर से लेकर प्रदेश स्तर पर संगठन और पदाधिकारी बना दिए गए लेकिन उन्हें कार्य करने के लिए जो एक समुचित व्यवस्था और संसाधनो की आवश्यकता होती है वह तो है ही नहीं, ऐसी व्यवस्था (सिस्टिम) बनाई ही नहीं गई । बिना किसी संसाधनो के पदाधिकारी परिणामकारक कार्य करे भी तो कैसे करे? फिर वह भी क्या करे? ज्यो, जितना कर सकते है करते है और जैसे तैसे अपना कार्यकाल पूरा कर लेते है । संसाधनो और व्यवस्था के आभाव में वह नाममात्र के पदाधिकारी बनकर रह गए है ।  इसलिए अब यह जरुरी है की एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जाये जिसमें पदाधिकारी और संगठन समाजबंधुओं के काम आ सके । समाजबंधुओं के विकास में, उन्नत्ति में अपना योगदान दे सकें ।

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