Wednesday 12 June 2024 8:35 PM
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पहरावणी (मायरा) पर समाजसेवी बाबू लाल बारोलिया द्वारा विशेष लेख

दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) l समाज में रुढ़िवादी मानसिकता के कारण न जाने कितनी ही ऐसी कुप्रथाएं और कुरीतियां हैं जिनसे महिलाएं अपने दैनिक जीवन में प्रताड़ित हो रही हैं । महिलाएं चाहे जिस भी वर्ग जाति समूह की रही हो वह जन्म से ही अपने आपको असहाय और अबला समझकर सदैव रुढ़िवादी सामाजिक परम्पराओं की शिकार होती रही है । इन्हीं रुढ़िवादी सामाजिक परम्पराओं में एक प्रथा है पहरावणी (मायरा) l इस प्रथापर समाजसेवी बाबू लाल बारोलिया ने काफी गहन मंथन कर इस पहरावणी (मायरा) की रोकथाम हेतु समाजहित में व रुढ़िवादी सामाजिक परम्पराओं से जकड़ी महिलाओ व उनके  पीहर पक्ष में मजबूरीवश हो रही आर्थिक हानि पर अपने महत्वपूर्ण विचार निम्न लेख द्वारा व्यक्त किये है :-

समाजसेवी बाबू लाल बारोलिया (सेवानिवृत) अजमेर

सामाजिक परम्पराओं में कई रीति-रिवाज होते हैं, ऐसा ही एक रिवाज होता है पहरावनी जिसको मायरा भी कहते है |  कई जगहों पर भात भरना भी कहा जाता है | राजस्थान में ये सबसे ज़्यादा प्रचलित है | आज से नहीं, लंबे वक़्त से. इसमें कोई व्यक्ति अपनी बहन-बेटियों के बच्चों के लिए, यानी भांजा-भांजी की शादी में मायरा लेकर आते हैं जिसमें गहने, कैश, कपड़े और बाक़ी सामान होता है | लोग अपनी हैसियत के हिसाब से मायरा भरते हैं | बहन बेटियों के ससुराल में जब सास ससुर की मृत्यु हो जाती है तो उनके मृत्यु भोज में भी मायरा भरते है | इसके अलावा भी बहन बेटियों के ससुराल में कई अवसरों पर कपडे औढाने का भी रिवाज प्रचलन में है, जैसे बच्चों के जन्म पर, नावण पर, कुआं पूजन पर,जडुला पर, किसी देवी देवताओं के प्रसादी, सत्संग,सवामनी पर, परिवार में किसी की मृत्यु होने पर उनकी बरसी पर, गृह प्रवेश, सेवा निवृति, बहन बेटियों के ससुराल में किसी रिश्तदार द्वारा किसी भी तरह के कार्यक्रम में आमंत्रित करने पर आदि अन्य छोटे मोटे अवसरों पर कपडे औढाने और पहराने का रिवाज बरसों से चला आ रहा है |

यह परम्परा कैसे और क्यों प्रारम्भ की गयी इसके पीछे कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है परन्तु प्राचीन काल में जब कोई बहन बेटी की शादी होने पर जब उसको विदाई का समय आता था तो उसको अपने माता पिता और भाई के द्वारा शगुन के तौर पर कुछ कपडे और उपहार देकर विदा करते थे | कालांतर में धीरे धीरे यह कपडे और उपहार की ये परम्परा एक प्रतिष्ठा बन गयी और यह प्रतिष्ठा रुढ़िवादी रिवाज में परिवर्तित हो गया और इस पप्रम्परा का रिवाज सभ्यता के विकास के साथ साथ विकराल रूप धारण होता हो गया और नारियों के जीव का जंजाल बन गया |

आज यह रुढ़िवादी परम्परा समाज में हर वर्ग के लिए चाहे वो गरीब हो या अमीर अपनी नाक का प्रश्न बन चुका है कि अगर हम अपनी बहन बेटियों के सुख दुःख में कपडे , गहने, नकदी आदि नहीं देंगे तो हमारी बहन बेटियाँ घर के आँगन में एक तरफ खड़ी होकर रोयेंगी और समाज तो ताने मारेगा ही लेकिन घर की ही औरतें जिनमे देवरानी, जेठानी, सास, ननद आदि जीवन भर ताने देती रहेगी कि ये तो अनाथ है | अतः समाज में लोक लाज के डर से अपनी अपनी हैसियत के अनुसार पहरावनी तो ले जानी ही पड़ेगी, चाहे इसके लिए कर्ज ही क्यों ना लेना पड़े| कहीं कहीं तो पहरावनी (मायरा) भरने के लिए लोगों को अपने खेत, जमीन मकान आदि तक सेठ,साहूकारों के यहाँ गिरवी रखना पद जाता है | अगर इस रुढ़िवादी परम्परा को दहेज़ का भी नाम दे दिया जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी |

अब पहला प्रश्न यह उठता है की इस रुढ़िवादी परम्परा से समाज के लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है ? इसमें किसको फायदा और नुकसान होता है | अपनी बहन बेटियों और रिश्तेदारों को नकद राशि और गहने देने तक का तो रिवाज कुछ मायने में ठीक लगता है कि ये तो उपयोग में लेने योग्य है परन्तु जो कपडे औढाने पहराने का रिवाज कहाँ तक उचित है ? मैं उन समाज के लोगों से यह पूछना चाहता हूँ कि जो कपडे जिनमें पेंट शर्ट, कोट आदि दिए जाते है वे कपडे आज तक कितने लोगों ने सिलवाकर पहने है | जो ओढ़नी, लहंगा, साड़ी, ब्लाउज दिए जाते है कितनी औरतें पहनती है | कपडे लेते समय उनको देखकर अपने मन में यह विचार नहीं आता है कि इन कपड़ों को देने के बजाय तो नहीं देते वो ही अच्छा था केवल नाम करने के लिए ऐसे कपडे देने की क्या आवश्यकता है | अगर नाम ही करना था तो पहनने लायक देते | फिर क्या होता है वे कपडे जब कपडे लेने वालों के घर कोई ऐसा अवसर आता है तो वे कपडे आगे से आगे व्हाट्सएप्प मैसेज की तरह फॉरवर्ड करते रहते है |

कभी कभी तो ऐसा अवसर भी देखा गया है कि वे कपडे वापस उन्ही के घर आ जाते हैं जहाँ से वो चले थे | ऐसी रुढ़िवादी परम्परा केवल अपने नाम के लिए जारी रखने से क्या फायदा है | इस तरह की कुरीतियों से सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान तो कपडे,गहने खरीदने वालों को ही होता है | वे अपने नाम और लोक लाज के भय से अपनी कमाई सारी उन दुकानदारों को सुपुर्द कर देते है और उनको पूरा आर्थिक सहयोग करते है और स्वयं गरीबी के कुएं में डूबकियां लगाते रहते है |

अब दूसरा प्रश्न यह उठता है कि क्या यह रूढ़िवादी परम्परा अनवरत जारी रहनी चाहिए ? यद्यपि किसी भी परम्परा को प्रारम्भ करना तो आसान है परन्तु जब यह परम्परा एक रुढ़िवादी बनजाती है तो उसको यकायक त्यागना समाज के लिए असम्भव सा लगता है क्योंकि हमारे पूर्वज ऐसा करते आये है इसलिए हमें उनकी परम्पराओं को तोड़कर उनकी आत्मा को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिए, इस क्रम में मेरे अपने निजी विचार से समाज को यह रुढ़िवादी परम्परा को समाप्त सा कर देना चाहिए, इसके लिए समाज में बने विभिन्न संगठनों को इसकी पहल करनी चाहिए, ताकि समाज में रोज कमाओं और रोज खाओ वाले गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को आर्थिक संबल मिल सके और अनावश्यक कर्ज से मुक्ति मिल सके | 

(डिस्क्लेमर: इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं l लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है, इसके लिए समाजहित एक्सप्रेस न्यूज़ पोर्टल उत्तरदायी नहीं है l)

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