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2 अप्रैल 2018 दलित संघर्ष दिवस पर बाबूलाल बारोलिया द्वारा विशेष लेख :

बाबूलाल बारोलिया, अजमेर

छः साल पहले का जब वो दिन याद आता है तो मन में एक सामाजिक क्रांति का शंखनाद का पुनः आभास हो जाता है। यद्यपि मैं उस क्रांति का हिस्सा नहीं बन पाया था लेकिन उस दिन को भूला भी नहीं सकता क्योंकि सोशल मीडिया पर सब कुछ आंखों देखा हाल देख रहा था।

आज से छह  वर्ष पूर्व एक सोशल मीडिया क्रांति के माध्यम से दलित समाज ने क्रांति का आव्हान किया था,एससी एसटी अत्याचार निवारण एक्ट की मूल भावना को बचाए रखने के लिए और सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक्ट में किए बेवजह के परिवर्तन को रोकने के लिए और दलित सामाजिक क्रांति ने अभूतपूर्व सफलता भी पाई थी लेकिन उस क्रांति में कई दलित भाइयों ने जेल जाने के साथ साथ 13 दलित बेटों अपनी कुर्बानी भी अर्पित कर दी थी। जिन्होंने अपने समाज के लिए कुर्बानी दी सोचो उस समय और आज दिन तक जिन 13 बेटों ने कुर्बानी दी उन 13 परिवार पर क्या बीत रही होगी।

डॉक्टर बाबा साहब भीमराव के बैनर तले इस नीली क्रांति में कोई नेता,अधिकारी,नेतृत्वकर्ता,झंडा,स्लोगन,राजनीतिक पार्टी या किसी का भी सपोर्ट नहीं था । केवल बाबा साहब के बताए संघर्षी जज्बातों के आधार पर इस दलित समाज की आंतरिक शक्ति और संगठन की मूल भावना ,और शिक्षा की रोशनी का प्रभाव था कि सारा देश उस दिन एक  अनुशासित सामाजिक आंदोलन को देख रहा था और प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से उसमे शामिल था । प्रत्येक दलित समाज के बच्चे से लेकर बूढ़े तक यह भावना जागृत हो चुकी थी किस प्रकार एससी एसटी एक्ट की मूल भावना को बचाया जाए ओर किस प्रकार अपनी आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित रखा जाय। अतः यहां कहने का वास्तविक मूल्य सिर्फ इतना सा है कि यदि दलित समाज में एकता कायम रखने का इरादा हो तथा अपनी ताकत, स्थिति को और अधिक सुदृढ़  बनाना चाहता है, अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना चाहता है  तो उसे किसी नेता,अधिकारी,पद, प्रतिष्ठा, पैसा, अथवा सहयोग की आवश्यकता नहीं है  बल्कि वर्तमान परिपेक्ष्य को मध्य नजर रखते खुद को आंतरिक रूप से सशक्त और शिक्षित बनाने की महति आवश्यकता है और जब समय की मांग हो तो संगठित हो कर संघर्ष के लिए तत्पर रहने की आवश्यकता है।

बाबा साहब ने एक नारा यह भी दिया था कि जो डर गया, वो मर गया, यानि डर के आगे जीत है अतः स्वयं मजबूत हो कर संघर्ष करने पर इस लिए जोर देना है। एक साल पूर्व अखिल भारतीय रैगर महासभा का राष्ट्रीय महासम्मेलन जो जयपुर आयोजित हुआ था वह सम्मेलन  राजनीति से प्रेरित नेतृत्व कर्ता के साथ दलित समाज को पुनः संगठित करने और दो अप्रैल के मुकदमे वापस करवाने का प्रयास राजनैतिक महत्वकांक्षा के साथ किया गया था जिसमे सम्मेलन भी असफल हुआ, दलित समाज की एकता को भी नुकसान हुआ । उस महासम्मेलन में तत्कालीन मुख्यमंत्री महोदय ने खुलकर कर आव्हान किया था कि तुम मांगते मांगते थक जाओगे लेकिन वे देते देते नहीं थकेंगे तो क्या 2 अप्रैल को जिन दलित बेटों पर मुकदमें चलाए थे वे उन्होंने महासभा की मांग पर मुकदमें वापस लिए थे जहां तक जानकारी है, वे मुकदमे आज दिन तक कुछ को छोड़कर वापस नही हुए हैं,जो मुकदमें वापस हुए अथवा कुछ लोग बरी हुए थे वे केवल अपने ही प्रयासों के बलबूते पर हुए थे, उसमें सामाजिक नेतृत्व का लेशमात्र भी सहयोग नहीं था। इसलिए  प्रत्येक दलित को स्वयं मजबूत बनना और संघर्ष करना ज्यादा जरूरी है । बाबा साहब तो वो फौलादी पुरुष थे जिन्होंने अकेले ही अन्याय और अत्याचार के खिलाफ चट्टान की तरह खड़े होकर पूरे दलित समाज को तो ऊंचाइयों तक पहुंचाया ही था परंतु सर्व समाज को बिना किसी भेदभाव के मानवता के नाते संघर्ष करना सीखा दिया ।

आज दलित समाज तो नाम मात्र सिर्फ दो दिन बाबा साहब को माल्यार्पण कर इतिश्री कर लेते है लेकिन वास्तव दलित समाज के अलावा अन्य समाज  उनके संघर्ष से सीख लेकर आज 85 % जनता पर 15% लोग शासन कर रहे है। सोचो हम कहां और किस स्थिति में है। आज दलित समाज शिक्षित होकर हर क्षेत्र में कामयाबी का परचम तो फहरा रहें है लेकिन सामाजिक एकता से कोसों दूर है। हमें  सिर्फ  राजनेता ,राजनीतिक पार्टी ,पद प्रतिष्ठा ,या पैसों के भरोसे रहने की बजाय खुद को मजबूत बनाना चाहिए, संगठित करना चाहिए, हर व्यक्ति रोजगार करें, शिक्षित बनने के साथ शिक्षित भी करें और यह सोच पैदा करें कि हर व्यक्ति सिर्फ डिग्री या नौकरी लेने के साथ साथ  कानून ,संविधान ,और अधिकारों के लिए खुद लड़ना सीखे और जो नही लड़ सके उसकी मदद करें, वर्तमान परिस्थिति का आकलन करते हुए क्यों नहीं 2 अप्रैल की भांति संगठित होकर अपने अधिकारों को प्राप्त करने के संघर्ष करें और बाबा साहब की तरह सूट बूट  और हाथ में हमेशा किताब  वाले आकर्षक  छवि ,व्यक्तित्व को अपनाएं आपकी पहचान , ताकत ,और सफलता सिर्फ और सिर्फ शिक्षा ,संघर्ष ,और संगठन में निहित हैं

किसी भी व्यक्ति विशेष की या राजनीतिक पार्टी  की चमचागिरी,किसी पर निर्भरता ,किसी की गुलामी, किसी का पिछलग्गू या किसी एक विचारधारा का अंधानुकरण और अपने ही दूसरे भाइयों की आलोचना आपको सिर्फ गुलाम बना सकते है शासक नही।

अतः जब भी शक्ति हीन महसूस करो तो बाबा साहेब को याद करो ,और दो अप्रैल 2018 के उस संघर्ष को याद करो जो दलित समाज के लोगों में स्वतः प्रस्फुटित हुआ था ।

वर्तमान परिपेक्ष्य को देखते हुए आज पुनः संगठित होकर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठानी है, बाबा साहब के संविधान की रक्षा करनी है, अतः आज पुनः बाबा के दिए मंत्रों का जाप करते हुए संघर्ष करना है अन्यथा पुनः गुलामी का दंश झेलने से कोई नहीं रोक सकता।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं । आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए समाजहित एक्सप्रेस उत्तरदायी नहीं है ।

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