Friday 04 April 2025 2:48 AM
Samajhitexpressजयपुरताजा खबरेंनई दिल्लीराजनीतिसमाज

प्रत्येक समाज की महासभाएं केवल सामाजिक संगठन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संगठन बन चुके हैं।

🙏🌹बाबू लाल बारोलिया, अजमेर 🙏🌹

वर्तमान समाजों में परिलक्षित परिदृश्यों का आकलन करने के पश्चात ही आज मेरे मन में कुछ लिखने की हलचल उत्पन्न हुई अतः आदरणीय समाज बंधुओं मेरे इन विचारों को पढ़कर आश्चर्य चकित मत होना क्योंकि हर समाज के नेताओं ने सामाजिक महासभा हो या छोटी बड़ी समाज सुधार सभाएं हों राजनीति का प्रवेश द्वार बना लिया है। चाहे समाज में एकता हो या नहीं हो। समाज में संचालित संगठनों ने किसी ना किसी राजनैतिक दल का चौला ओढ रखा है और जब चुनाव का मौसम आता है  उसी का प्रचार प्रसार करने में व्यस्त रहते है। जिस उद्देश्य के लिए सामाजिक संगठन का निर्माण किया जाता है उस मुख्य उद्देश्य से हटकर केवल राजनीति की ही चर्चा होती दिखाई देती है। जहां भी सामाजिक सभाएं होती है वहां समाज सुधार, एकता और विकास की बातों का जरा भी जिक्र नहीं होता और राज्य और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को आमंत्रित कर ईशतुल्य आदर सत्कार करते है और कहां  केवल राजनीतिक विकास के गुर पढ़ाए जाते है।  समाज के संगठन और सत्ता ये दोनों अलग अलग हैं। संगठन चलता है कार्यकर्ताओं से और सत्ता चलती है नेताओं से।

यह अलग बात है कि आज कई जगह नेता तो कार्यकर्ता दिखना चाहते हैं, जबकि कार्यकर्ता नेता। जीवंत संगठन में कार्यकर्ताओं से नेता बनने का क्रम चलता रहता है। प्रत्येक समाज की महासभा एक सामाजिक संगठन है, और इस संगठन में जो भी पदाधिकारी है अथवा चुनाव के बाद जो पदाधिकारी सत्तारूढ़ होंगे वे सभी धनवान, बलवान और ज्ञानवान तथा कुछ राजनीतिज्ञ ही होते है ।  इसमें आम आदमी कहीं नहीं है। जब चुनाव होते है चाहे वो सामाजिक संगठन के हों या राजनीतिक संगठन के जो नेता चुनाव मैदान में खड़े होते है वे अपना प्रचार स्वयं नहीं करते । लोगों को लुभावने का कार्य स्वयं नहीं करते बल्कि वे अपने चहेते समर्थकों से करवाते है क्योंकि नेता आम आदमी को जानते तक नहीं है। इसका ताजा उदाहरण मेरे पास है। मैं भी एक महासभा का सदस्य हूँ, मेरे पास किसी भी नेता का फ़ोन नहीं आया बल्कि उन नेताओं के चहेते सज्जनों का ही फ़ोन दो तीन बार आया कि फलां पैनल को सहयोग करना है । वे स्वयं अपना प्रचार करने हेतु आम लोगों में जा नहीं सकते इसलिए अपने प्रचारकों को भेज देते है। भेजने से पहले उनको बहुत ही अच्छे तरीके से पट्टी पढ़ाई जाती है । ऐसा नहीं है। प्रायः हरेक प्रचारक इस रीति से तैयार हुआ होता है कि किसी भी क्षेत्र में भेजने पर वह वहां कार्य आरम्भ कर देता है। जाओ और काम करो।इसके अलावा व्यवहार का भी बहुत बड़ा योगदान होता है।

यदि कभी कोई संगठक नेता बन जाता है तो वह बहुत चमकता है, क्योंकि एक तो वे घाट घाट का पानी पिये होते हैं, उन्हें आशा, निराशा प्रभावित नहीं करती। समाज के बीच निरन्तर उठते, बैठते, खाते पीते, वे उसका हरेक रहस्य जानते हैं। आप प्रचारक को एक ही समय किसी बहुत बड़े धर्मगुरु से गप्पें लगाते हुए और किसी बच्चे से ठिठोली करते देख सकते हैं। वे यह सब बहुत सहजता से कर लेते हैं। वे साफ सुथरे रहते हैं, सादगी, भव्यता, हर प्रकार के अनुभव में सहज, मुस्कुराते हुए मिलेंगे आपको। तो ऐसे लोग कुल मिलाकर वीतरागी तपस्वी होते हैं। भक्त भी होते हैं। अत्यंत व्यवहारिक भी होते हैं। और यदि इन्हें क्षितिज पर चमकने को छोड़ दिया जाए तो अत्यंत वेग से चमकते हैं।

आज प्रचारकों में 80% से अधिक ऐसे ही हैं, जैसे आजकल बड़ी बड़ी राष्ट्रीय स्तर की राजनैतिक दलों के प्रमुख नेता हैं। उन्हें कहीं फिट कीजिए वे सक्रिय हो जाएंगे। ये ऐसे ही नवीनतम गुणों से युक्त हैं।

किसने सोचा था, 70 के दशक में साइकिल के कैरियर पर बैठकर सभाएं करने जाते अटल बिहारी एक दिन प्रधानमंत्री बन जाएंगे?किसने सोचा था कि रेल्वे प्लेट फॉर्म चाय बेचने वाला भी एक दिन देश का प्रधानमंत्री बन जाएगा?

क्या आपने 1980 से 90 के बीच के मोदीजी, योगीजी के जीवन को समझा है? तब कौन जानता था कि ये तेजतर्रार युवा एक दिन करोड़ों लोगों के चहेते बन जाएंगे।

आज से 50-60 वर्ष पहले हमारे पास सिर छिपाने को छत नहीं थी, गिने चुने लोगों के पास साइकिल हुआ करती थी, पढ़ना लिखना बामुश्किल होता था, गरीबी रेखा से भी नीचे थे परन्तु आज वैसा नहीं है। आज हमारे पास क्वालिटी भी है, क्वांटिटी भी है। साधारण आम लोगों के अलावा भी समाज में हजारों वकील, सीए, पत्रकार, चिकित्सक, लेखक, डॉक्टर, इंजीनियर,शिक्षक,प्रोफेसर , आईएएस , आर ए एस और विद्वान हैं। सभी एक ध्येय से, एक दिशा में, एक ही लक्ष्य की तरफ निरन्तर गतिमान हैं।हर शिक्षित वर्ग की यह चाहना है कि वे समाज सेवा करके राजनीतिज्ञ बन जाना और देश सेवा भी करना । इसलिए समाज में विभिन्न प्रकार के संगठन बनाकर उसमें उच्च पद हासिल करके नेता बनने का मुख्य उद्देश्य रह गया है। उपरोक्त विवेचन के आधार पर यही निष्कर्ष निकलता है कि वर्तमान प्रत्येक समाज का संगठन एक सामाजिक संगठन नहीं होकर राजनीतिक संगठन बन चुका है इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है। अंत में एक बात और कहना चाहूंगा कि हम समाज सुधार के नाम से विभिन्न तरह के संगठन बना तो लेते है लेकिन क्या कभी एकता प्रदर्शित कर पाए है,क्या कभी समान विचारधारा का प्रदर्शन हुआ है ? हम सिर्फ पद लालसा में परस्पर टांग खिंचाई के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे है । सर्व समाज के हित साधक , संविधान निर्माता, विश्व  ज्ञान के प्रतीक डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि सामाजिक एकता के बिना राजनैतिक लाभ अर्थहीन है अतः सर्व प्रथम सामाजिक एकता स्थापित करें, राजनैतिक लाभ स्वतः मिल जाएगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए समाजहित एक्सप्रेस उत्तरदायी नहीं है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close