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कलम की ताकत को कम मत समझिए

बाबू लाल बारोलिया (लेखक एवं समाज चिंतक, अजमेर)

—सामाजिक परिवर्तन केवल मंच, पद, भीड़ और आर्थिक सहयोग से नहीं आता; विचार, प्रश्न, ज्ञान और जागरूकता भी परिवर्तन की उतनी ही शक्तिशाली ताकत हैं। इसी भाव को रखते हुए आलेख प्रस्तुत है।

समाज परिवर्तन की असली शुरुआत विचारों से होती है

आज समाज का शायद ही कोई ऐसा वर्ग या समुदाय हो, जहाँ विभिन्न नामों और उद्देश्यों से संगठन अस्तित्व में न हों। गाँव से लेकर कस्बे तक, गली-मोहल्ले से शहर तक और शहर से लेकर अखिल भारतीय स्तर तक अनेक सामाजिक संगठन सक्रिय हैं। कहीं शिक्षा के नाम पर संगठन है, कहीं समाज सेवा के नाम पर, कहीं समाज सुधार के नाम पर, कहीं राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए और कहीं सामाजिक एकता के नाम पर।

इन संगठनों में अनेक प्रतिष्ठित, शिक्षित, अनुभवी, आर्थिक रूप से सम्पन्न और उच्च पदों से सेवानिवृत्त लोग जुड़े हुए हैं। निश्चित रूप से उनमें ऐसे लोग भी हैं जो समाज के लिए ईमानदारी से काम कर रहे हैं। लेकिन एक कड़वा प्रश्न यह भी है—क्या हमारे सामाजिक संगठनों में वास्तव में जमीन से जुड़े, संघर्षशील, ईमानदार और निर्भीक लोगों के लिए पर्याप्त स्थान है?

अक्सर देखने में आता है कि संगठन बनाने और सदस्य बनाने के समय गरीब, मध्यमवर्गीय और सामान्य परिवारों के लोगों को बड़े उत्साह से जोड़ा जाता है। उन्हें समाज की ताकत बताया जाता है। लेकिन जब संगठन में निर्णय लेने, नेतृत्व करने अथवा महत्वपूर्ण पद देने की बात आती है तो वही सामान्य व्यक्ति पीछे कर दिया जाता है।

क्यों?

क्योंकि वह व्यक्ति शायद प्रश्न पूछता है।

वह हिसाब मांगता है।

वह पारदर्शिता की बात करता है।

वह पद को सम्मान नहीं, जिम्मेदारी समझता है।

और सबसे बड़ी बात—वह किसी व्यक्ति की नहीं, सिद्धांत की तरफ खड़ा होना चाहता है।

ऐसे लोगों को संगठन में रखना कई लोगों को असुविधाजनक लगता है। सच बोलने वाले हमेशा सुविधाजनक नहीं होते।

सामाजिक संगठनों में एक विचित्र मानसिकता विकसित होती जा रही है। जो व्यक्ति हर बात पर तालियाँ बजाए, पदाधिकारियों की प्रशंसा करे और किसी निर्णय पर सवाल न उठाए, वह “अच्छा कार्यकर्ता” कहलाता है, लेकिन जो व्यक्ति पूछे कि संगठन ने पिछले वर्ष क्या किया?

समाज के लिए कितनी राशि खर्च हुई?

आय-व्यय का हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं है?

युवाओं को नेतृत्व में अवसर क्यों नहीं दिया जा रहा?

महिलाओं की भागीदारी कितनी है?

गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा के लिए क्या किया गया?

समाज में व्याप्त कुरीतियों, अंधविश्वास, पाखंड और रूढ़िवादिता के खिलाफ क्या अभियान चलाया गया?

वह व्यक्ति अचानक “आलोचक” बन जाता है!

यह कैसी सामाजिक व्यवस्था है, जहाँ प्रश्न पूछना अपराध और प्रशंसा करना योग्यता बन जाए?

जब मंच पर जगह न मिले तो कलम रास्ता दिखाती है

हर व्यक्ति मंच पर जाकर भाषण नहीं दे सकता। हर व्यक्ति संगठन का पदाधिकारी नहीं बन सकता। हर व्यक्ति आर्थिक सहयोग देने की स्थिति में भी नहीं होता,:लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह समाज के लिए कुछ कर ही नहीं सकता।

किसी के पास धन है तो कोई अपना समय दे सकता है।

किसी के पास संगठनात्मक शक्ति है तो किसी के पास अनुभव है।

और किसी के पास सबसे बड़ी शक्ति है—उसकी कलम।

कलम केवल कागज पर शब्द लिखने का साधन नहीं है। कलम विचारों को जन्म देती है, सवाल खड़े करती है, सोई हुई चेतना को जगाती है और समाज को आईना दिखाती है। इसीलिए जब किसी व्यक्ति को मंच नहीं मिलता, तो वह कलम को मंच बना लेता है।जब उसकी आवाज सभा में नहीं सुनी जाती, तो वह लेख के माध्यम से हजारों लोगों तक पहुँचती है।जब संगठन उसकी बात को दबा देता है, तो उसका विचार सोशल मीडिया के माध्यम से घर-घर पहुँच सकता है और यही कारण है कि डिजिटल युग में कलम की शक्ति पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

इतिहास गवाह है—क्रांतियाँ पहले विचारों में जन्म लेती हैं

दुनिया में कोई भी बड़ा परिवर्तन अचानक नहीं आया। परिवर्तन से पहले विचार पैदा हुए और उन विचारों को समाज तक पहुँचाने का काम लेखकों, कवियों, पत्रकारों और चिंतकों ने किया।

राजा राममोहन राय ने सती प्रथा जैसी कुरीति के खिलाफ विचारों और लेखन के माध्यम से सामाजिक चेतना जगाई।

महात्मा ज्योतिबा फुले ने शिक्षा, जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध अपनी लेखनी और विचारों को हथियार बनाया। उन्होंने समाज से सवाल किया और शोषित वर्ग को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया।

सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का माध्यम बनाया। उनका संघर्ष केवल विद्यालय तक सीमित नहीं था; वह उस सोच के विरुद्ध था जो महिलाओं और वंचितों को शिक्षा से दूर रखना चाहती थी।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपनी लेखनी, पत्रकारिता और पुस्तकों के माध्यम से सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता को चुनौती दी। मूकनायक, बहिष्कृत भारत और उनकी अनेक रचनाएँ केवल शब्द नहीं थीं—वे सामाजिक परिवर्तन के औजार थे।

महात्मा गांधी ने Young India और Harijan जैसे माध्यमों से देश और समाज से संवाद किया। उनकी लेखनी ने लाखों लोगों के विचारों को प्रभावित किया।

भगत सिंह केवल बंदूक उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे; वे गंभीर पाठक और लेखक भी थे। उनके लेखों और विचारों में एक जागरूक, वैज्ञानिक और स्वतंत्र भारत की कल्पना दिखाई देती है।

गणेश शंकर विद्यार्थी ने पत्रकारिता को सत्ता और अन्याय के सामने सच बोलने का माध्यम बनाया। उन्होंने पत्रकारिता को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी माना।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि बड़ी क्रांति पहले विचार बनती है, फिर शब्द बनती है और उसके बाद जनआंदोलन का रूप लेती है।

“व्हाट्सऐप वीर” कहकर विचारों को खारिज करना आसान है

आज यदि कोई व्यक्ति लगातार सामाजिक विषयों पर लिखता है तो कुछ लोग उसे व्यंग्य में “व्हाट्सऐप वीर”, “फेसबुकिया” या “सोशल मीडिया का ज्ञान बांटने वाला” कह देते हैं।ऐसा कहना कितना सरल लगता है उसको समाज की नजरों में गिराने के लिए।

उनसे एक विनम्र प्रश्न है—

यदि विचारों को शब्द देना इतना ही बेकार है, तो दुनिया भर में पुस्तकें क्यों लिखी गईं? अखबार क्यों निकले? पत्र-पत्रिकाएँ क्यों प्रकाशित हुईं? संविधान क्यों लिखा गया? सामाजिक आंदोलनों के घोषणापत्र क्यों बने?

सोशल मीडिया स्वयं न अच्छा है न बुरा। उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है, यह महत्वपूर्ण है।

यदि कोई व्यक्ति झूठ, अफवाह और नफरत फैला रहा है तो उसकी आलोचना होनी चाहिए, लेकिन यदि कोई व्यक्ति शिक्षा, समानता, सामाजिक सुधार, पर्यावरण, पारदर्शिता, संविधान, अधिकार, कुरीतियों और समाज की समस्याओं पर लिख रहा है, तो उसकी बात को केवल इसलिए खारिज कर देना कि वह मैदान में नहीं उतरता, उचित नहीं है।

हर व्यक्ति का संघर्ष करने का तरीका अलग होता है।

कोई धरना देता है।

कोई संगठन बनाता है।

कोई आर्थिक सहायता देता है।

कोई गरीब बच्चे की फीस भरता है।

और कोई अपनी पूरी जिंदगी लिखने में लगा देता है।

सभी की अपनी भूमिका है।

केवल पैसा देना ही समाज सेवा नहीं है

आज समाज सेवा को अक्सर आर्थिक सहयोग से जोड़ दिया जाता है। निश्चित रूप से किसी संगठन को चलाने के लिए धन की आवश्यकता है। विद्यालय, छात्रावास, अस्पताल, पुस्तकालय, छात्रवृत्ति और सामाजिक कार्यक्रम बिना संसाधनों के नहीं चल सकते।

लेकिन क्या समाज सुधार केवल चंदा देने से हो जाएगा?

यदि समाज में अंधविश्वास है, कुरीतियां है, रूढ़िवादी परंपराएं है,और हम उसके खिलाफ नहीं लिखेंगे, तो धन किस काम आएगा?

यदि दहेज प्रथा, मृत्युभोज, मायरा, पहरावनी और मनुवादी कर्मकांड  जारी है और हम उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएंगे, तो आर्थिक विकास किस काम आएगा?यदि इन कुप्रथाओं के कारण गरीब परिवार कर्ज में डूब रहे हैं और हम चुप रहेंगे, तो हमारी सामाजिक एकता किस काम की?

यदि युवा शिक्षा और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं और हम केवल मंचों पर मालाएँ पहनाते रहेंगे, तो समाज आगे कैसे बढ़ेगा?

समाज को धन भी चाहिए और दिशा भी। संगठन भी चाहिए और विचार भी। कार्यकर्ता भी चाहिए और विचारक भी।

ज्ञान बांटना भी एक कठिन सामाजिक सेवा है

क्या मुफ़्त में ज्ञान बांटना ,जैसा लोग सोचते है, इतना आसान है? आलोचना करने वाले अक्सर कहते हैं—“केवल सोशल मीडिया पर लिखने से क्या होगा? जमीन पर आओ, समय दो, पैसा दो।”

यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है कि विचारों को व्यवहार में बदलना आवश्यक है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि विचार के बिना व्यवहार दिशाहीन हो सकता है।

एक व्यक्ति प्रतिदिन कई घंटे पढ़ता है, तथ्यों को खोजता है, इतिहास समझता है, कानून और संविधान पढ़ता है, समाज की समस्याओं पर चिंतन करता है और फिर एक लेख तैयार करता है। ऐसा ज्ञान बांटने वाले लेखों में तन, मन और दिमाग भी खर्च करना पड़ता है ।

क्या यह आसान काम है?

हरगिज नहीं।

किसी को मंच पर दस मिनट बोलने के लिए आमंत्रित करना आसान है, लेकिन समाज के लिए एक सार्थक लेख लिखने के लिए वर्षों का अध्ययन, अनुभव और चिंतन चाहिए।

कलम चलाने वाला व्यक्ति भी समाज के लिए अपना समय दे रहा है—बस उसका मैदान अलग है।

हमें संगठन नहीं, स्वस्थ सामाजिक संस्कृति चाहिए

आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि समाज में कितने संगठन हैं।आवश्यकता इस बात की है कि उन संगठनों में कितनी लोकतांत्रिक सोच है।

कितने संगठन अपनी आय-व्यय रिपोर्ट सार्वजनिक करते हैं?

कितने संगठन नियमित चुनाव कराते हैं?

कितने संगठन युवाओं और महिलाओं को नेतृत्व का अवसर देते हैं?

कितने संगठन अपने आलोचकों की बात सुनते हैं?

कितने संगठन पद को अधिकार नहीं बल्कि जिम्मेदारी मानते हैं?

और कितने संगठन यह स्वीकार करने को तैयार हैं कि उनसे भी गलतियाँ हो सकती हैं?

यदि सामाजिक संगठन सचमुच समाज सुधार के लिए बने हैं तो उन्हें आलोचना से डरना नहीं चाहिए।

आलोचक शत्रु नहीं होता; वह संगठन का आईना हो सकता है।

कलम को हथियार नहीं, मशाल बनाइए

जो लोग आज कलम से लिख रहे हैं, उन्हें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। लेखनी स्वतंत्र हो, लेकिन तथ्यहीन नहीं।

आलोचना हो, लेकिन व्यक्तिगत अपमान नहीं।

प्रश्न हों, लेकिन द्वेष नहीं।

विरोध हो, लेकिन प्रमाण और तर्क के साथ।

लेखनी किसी व्यक्ति को गिराने के लिए नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए होनी चाहिए।

क्योंकि कलम की असली शक्ति किसी को बदनाम करने में नहीं, बल्कि हजारों लोगों को सोचने के लिए मजबूर करने में है।

अंततः…

समाज को केवल ऐसे लोगों की आवश्यकता नहीं है जो मंच पर भाषण दे सकें।

समाज को उन लोगों की भी आवश्यकता है जो चुपचाप बैठकर सोच सकें।

जो प्रश्न पूछ सकें।

जो इतिहास से सीख सकें।

जो वर्तमान को आईना दिखा सकें।

जो भविष्य की दिशा बता सकें।

और जो अपनी कलम से सोई हुई चेतना को जगा सकें।

इसलिए किसी लेखक को “व्हाट्सऐप वीर” या “फेसबुकिया” कहकर उसकी बात को छोटा मत कीजिए।

हो सकता है जिस मोबाइल की स्क्रीन पर आपको केवल एक पोस्ट दिखाई दे रही हो, उसके पीछे किसी व्यक्ति की वर्षों की पीड़ा, अनुभव, अध्ययन और सामाजिक चिंता छिपी हो।

याद रखिए—

तलवार शरीर को घायल कर सकती है,

लेकिन कलम विचारों को बदल सकती है।

तलवार से युद्ध जीता जा सकता है,

लेकिन कलम से समाज जीता जाता है।

धन से भवन बनाया जा सकता है,

लेकिन विचारों से समाज बनाया जाता है।

और इतिहास की सबसे बड़ी सच्चाई यही है—

«“क्रांति पहले मनुष्य के विचारों में जन्म लेती है, फिर उसकी आवाज बनती है और अंततः समाज की दिशा बदल देती है।”»

इसलिए मंच पर स्थान मिले या न मिले,संगठन में पद मिले या न मिले,लोग आपकी बात सुनें या न सुनें—

यदि आपके पास सच है, तो लिखते रहिए।

यदि आपके पास विचार है, तो बाँटते रहिए।

यदि आपके भीतर समाज की पीड़ा है, तो बोलते रहिए।

क्योंकि संभव है आज आपकी कलम की आवाज को कुछ लोग नजरअंदाज कर रहे हों, लेकिन कल वही शब्द किसी एक युवा की सोच बदल दें, किसी एक परिवार को कुरीति से बचा लें, किसी एक व्यक्ति को अपने अधिकार के लिए खड़ा कर दें और किसी एक समाज को नई दिशा दे दें।

यही कलम की असली जीत है।

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