बिखरा समाज, बेआवाज़ राजनीति
दिल्ली, समाजहित एक्सप्रेस (रघुबीर सिंह गाड़ेगांवलिया) l समाज की वास्तविक प्रगति तब होगी जब समाज के प्रबुद्ध लोगो द्वारा शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक एकता को समान रूप से बढ़ावा दिया जाए। समाज को दिशा देना, उसका मार्गदर्शन करना, समाज के बुद्विमान लोगों का दायित्व है । इसी दायित्व को निभाने हेतु अजमेर से बाबू लाल बारोलिया (सेवानिवृत) ने समाज में बदलाव लाने और उसे नई दिशा देने के लिए सामाजिक एकता को प्राथमिकता देने हेतु सारगर्भित लेख प्रस्तुत किया है, जो समाजहित एक्सप्रेस के माध्यम से आपके समक्ष पेश है :
बाबू लाल बारोलिया, अजमेर
क्या कोई समाज बिना एकता के राजनीति में भागीदारी कर सकता है?
उत्तर कड़वा है, लेकिन सच है— नहीं।
जो समाज आपस में बंटा हुआ है, वह राजनीति में भागीदार नहीं, केवल उपयोग की वस्तु बनता है। ऐसे समाज के वोट तो गिने जाते हैं, पर विचार नहीं। उसकी भीड़ तो काम आती है, पर आवाज़ नहीं। राजनीति शक्ति की भाषा समझती है, और शक्ति का पहला सूत्र है सामाजिक एकता।
जब समाज जातियों, उपजातियों, गुटों, स्वार्थों और अहंकार में उलझा रहता है, तब नेता पैदा नहीं होते—
तब केवल दलाल, ठेकेदार और स्वयंभू मसीहा जन्म लेते हैं।
ऐसे समाज में चुनाव के समय भाषण होते हैं, वायदों की बरसात होती है,
लेकिन सत्ता मिलने के बाद वही समाज फिर से हाशिए पर धकेल दिया जाता है।
इतिहास गवाह है— जिस समाज ने एकता नहीं बनाई, उसकी राजनीति दूसरों ने तय की।
और जिस समाज ने संगठन खड़ा किया, वह सत्ता के दरवाज़े पर दस्तक नहीं देता— वह दरवाज़ा खुलवाता है।
डॉ. आंबेडकर ने चेताया था— “सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र एक धोखा है।”
लेकिन हमने लोकतंत्र को केवल वोट डालने तक सीमित कर दिया, और सामाजिक चेतना को समारोहों और जयंती भाषणों में कैद कर दिया।
जब तक समाज यह नहीं समझेगा कि— व्यक्ति से बड़ा समाज है, और समाज से बड़ा उसका भविष्य—
तब तक राजनीति में उसकी भागीदारी केवल काग़ज़ी बनी रहेगी।
आज ज़रूरत है भावनाओं की नहीं, दृष्टि की, नारों की नहीं, नीति की और सबसे ज़्यादा— एकता की।
क्योंकि याद रखिए— बिखरा हुआ समाज कभी सत्ता नहीं बदलता, वह केवल सत्ता बदलते देखता है।
अब भी समय है। या तो समाज संगठित होकर राजनीति को दिशा दे, या फिर बंटा रहकर हमेशा दूसरों की राजनीति का शिकार बना रहे। चुनाव हमारा है— एकता या उपेक्षा।
डिस्क्लेमर: इस लेख में लेखक के व्यक्तिगत विचारों और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य पर आधारित एक सामान्य टिप्पणी है।



