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अन्तराष्ट्रीय नर्स दिवस विशेष : श्रीमति धन्नी दाई (खटनावलिया) -रैगर समाज की प्रथम नर्स

🙏🌹 रवि शंकर देवतवाल 🌹🙏

15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो लाखों लोगों को देश के विभाजन का दंश झेलना पड़ा था । हमने कई फिल्मों में देखा कि विभाजन के समय पाकिस्तान से ट्रेन आ रही है और उसकी छत पर लोग बेहाल लटके हुए हैं,  उन्ही ट्रेनो मे से एक की छत पर बैठे पाकिस्तान से दिल्ली आने वाले धन्नी देवी दाई का परिवार भी था।*

1925 के आसपास राजस्थान के रतनगढ़ में रहने वाले आशाराम खटनावलिया जी अपने परिवार के साथ “कसूर” रावलपिंडी के पास अविभाज्य पाकिस्तान में काम करने के लिये गए । वे वहां पर ईट के भट्टे पर ईट बनाने का काम करते थे,  उन्हीं मजदूरों में “बागड़” गंगापुर सिटी से आया हुआ धन्नी देवी का परिवार भी था। उनका परिवार भी ईटे बनाने का काम करता था । वहीं आसाराम खटनावलिया जी ने अपने पुत्र माला राम की शादी दूसरे साथी मजदूर की बेटी धन्नी देवी के साथ की थी ।

मालाराम खटनावलिया जी की शादी के बाद उनके दो पुत्र हुए जिनके नाम “मनीराम” और “प्रकाश चंद्र” रखे गये । 1947 का वह शुभ दिन भी आया जब देश आजाद हुआ,  लेकिन भारत के विभाजन के साथ ही हिंदुस्तान और पाकिस्तान में मार-काट और अफरा-तफरी शुरू हो गई। पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं को मारा जाने लगा।  मालाराम जी भी अपनी पत्नी धन्नी देवी और 10 साल के बेटे मनीराम और 6 महीने के प्रकाश चन्द्र के साथ हिंदुस्तान को जाने वाली एक खचाखच भरी ट्रेन की छत पर सवार हो गए।

ट्रेन के चलते वक्त पूरे रास्ते बहुत ही भयावह दृश्य था , लोग चलती ट्रेन के पीछे दौड़ रहे थे,  ट्रेन खचाखच भरी हुई थी। धन्नी देवी अपने 6 महीने के बेटे प्रकाश चन्द्र को सीने से चिपकाए और माला राम जी अपने 10 साल के बेटे मनीराम को अपने हाथ से कस के पकड़े हुए ट्रेन की छत पर बैठे हुए थे। उन्हें डर यह नहीं था कि वह गिर जाएंगे,  बस उनके मन  मे यही था,  कि कैसे ना कैसे वो सब हिंदुस्तान की सरजमी को चूम ले,  क्योंकि यहां रुके तो जान से मारे जाएंगे। इसी बीच रास्ते मे पाकिस्तान के “पीलीबंगा” गांव के पास जब ट्रेन पहुंची तो मुसलमान दंगाईयो ने ट्रेन को रोक लिया और मारपीट और लूटपाट शुरू कर दी । माला राम जी घबराकर ट्रेन से उतरकर जंगल में अपने बच्चो और पत्नि के साथ भागे । किसी तरह वे अपने परिवार को लेकर सुरक्षित जगह जाकर छुप गये । 3 दिन बाद वे छुपते छुपाते पैदल पैदल भूखे प्यासे किसी तरह एक ट्रेन जो दिल्ली जा रही थी उसकी छत पर बैठ कर दिल्ली पहुंचे ।

सुबह 4:00 बजे का समय था, जब ट्रेन ने उन्हें पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतारा। भूखे प्यासे बेहाल जब वे स्टेशन से बाहर निकले तो उन्होंने स्टेशन के बाहर खड़े एक तांगे वाले से पता किया कि दिल्ली में रैगर समाज के राजस्थानी लोग कहां रहते हैं?  तांगे वाले ने उनकी व्यथा सुनते हुए उन्हें अपने तांगे में बैठा कर तांगा स्टैंड रैगरपुरा में छोड़ दिया व  बताया कि यहां आपके समाज के हजारो लोग रहते है वे आपकी जरूर मदद करेगे। नजदीक ही हाथी वाला चौक पर उन्हें “चारा कुट्टी” की मशीन दिखाई दी , जहां पर चारा काटा जा रहा था ( आजकल गंगा मंदिर के पास बर्तन की दुकान) ।  चारा कुट्टी चलाने वाले दो भाई स्वर्गीय श्री नानू घरबारिया जी और स्वर्गीय श्री रूढ़ा राम घरबारिया जी को जब उन्होंने अपनी व्यथा बताई तो उन दोनों भाइयों की आंखों में आंसू भर आये । उन्होंने उन को खाना खिलाया , सहारा दिया और उन्हें अपने मकान में रहने के लिए जगह दे दी। आसरा मिलने के बाद दोनों पति-पत्नी वही पर चारा काटने का काम करने लगे और जब चारा काटने का काम नहीं होता था  तो वे धोली प्याऊ पर ईंटे बनाने के काम की मजदूरी करने चले जाते थे । तीन साल तक वे वहाँ रहे ओर वही उनकी एक बेटी शांति का जन्म हुआ।

सन 1950 मे जब देश के प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु ने WEA चैना मार्केट एरिया की कोठियां पाकिस्तान से आये हुए व्यापारियो को बनाकर अलाॅट की,  तो समाज के 56 गरीब परिवारो को जो पाकिस्तान से आये थे उन्हे भी 35- 35 गज के 56 मकान दिये गये । उन्ही मकानो को बाद मे 56 क्वाटर WEA के नाम से प्रसिद्धि मिली। उन्ही 56 मकानो मे एक मकान धन्नी देवी जी के परिवार को भी मिला। रहने का पक्का आसरा मिलने के बाद धन्नी देवी के परिवार के लिये अब समय अपनी रफ्तार पकड़ चुका था ।

धन्नी देवी जी खटनावलिया में एक खास हुनर भी था,  जब वह ईंटो के भट्टे पर पाकिस्तान में काम करती थी तो साथी मजदूरो के यहां जब बच्चे का जन्म होता था तो वह मदद करती थी या ये कहिये वह दाई का काम भी करती थी । दिल्ली मे जब लोगो को धन्नी देवी जी के दाई के काम के बारे मे पता चला तो प्रसव के समय क्षेत्र के लोग उनको बुलाने लगे । आमदनी का जरिया शुरू हुआ। धीरे धीरे उन्होने इसे सेवा ओर रोजगार दोनो के रूप मे अपनाने की सोची । प्रसव मे आने वाली दिक्कतो के निदान के लिये उन्होने इसकी ट्रेनिंग ली ओर ट्रेनिंग के बाद रैगर समाज की सर्वप्रथम नर्स बनी व लाइसेंस हासिल किया। उस समय प्रसव कराने मे निपुण नर्स महिलाओ को लाइसेस दिया जाता था । 1955 का वो लाइसेंस उनके परिवार के पास आज भी सुरक्षित है ।

धन्नी देवी जी “दाई” के अन्दर कमाई से ज्यादा सेवा भाव कूट कूट कर भरा हुआ था । उन्होने गरीबी देखी थी । वे जानती थी कि रैगर समाज गरीब है उसी की तरह मजदूरी करता है । वे गरीब महिलाओ के प्रसव बिना पैसे लिये करती थी । समृद्ध परिवारो से भी उन्होने कभी मुंह से बोलकर पैसे नही लिये । जितने मिलते थे वह उसी मे खुश रहती थी । गर्भवती महिलाओ को परेशानी आने पर वो देशी दवाओ से उनका इलाज करती थी । फीस थी मात्र 25 पैसे । देशी दवाये वो खुद कूट पीस कर बनाती थी ।

समय के साथ ओर प्रसिद्धि हुई । रोजाना लगभग अपने घर के पास वाले पार्क मे लगभग 150 से 200 गर्भवती महिलाओ की जांच करती थी । खूब भीड रहती थी ।  दिल्ली मे ऐसा कोई परिवार नही था जो धन्नी देवी जी “दाई” को नही जानता हो । हजारो बच्चो को उन्होने अपने हाथो से जन्म दिया जिनकी गिनती ना उन्हे, ना ही परिवार के किसी सदस्य को पूरा पूरा पता थी । पुरानी दिल्ली के कई नवाब,  सेठ , जौहरी, रैगर पुरा के व्यापारी,  पटेल नगर,  राजेन्द्र नगर , करोल बाग के कई नामी हस्तियाँ जो आज भी मोजूद है उन्ही के हाथो जन्मे है । उनकी प्रसव कराने मे निपुणता इतनी थी कि कई बार दिल्ली के AIIMS ,  सफदरजंग अस्पताल के डाक्टर भी केस मे जटिलता आने पर उन्हे घर से आकर ले जाते थे । इतनी निपुण थी वो।

उनके बारे में यह भी मशहूर था कि वह इतनी तजुर्बे दार हैं कि वह गर्भवती महिला के हाव-भाव और पेट देखकर पहले ही जान जाती है कि किसके लड़का होगा ओर किसके लड़की। जब उनसे पूछा जाता तो वह सुनकर ह॔स देती थी। लेकिन उन्होंने अपने इस अदृश्य ज्ञान का कभी फायदा नहीं उठाया उनकी एक ही सोच थी कि जन्म देना प्रभु का अधिकार है वह लड़का है या लड़की,  हम तो बस उसके खिलोने मात्र है इस संसार मे प्रभू की इच्छा से जन्म लेने का अधिकार सभी का है। उसके आदेश मे विध्न डालने का पाप कभी नही करना चाहिये ।

5 सितंबर 1969 का वह दिन भी आया जब धन्नी देवी जी  ने अपने घर में अंतिम सांस ली। मात्र 49 साल की उम्र में वह अन्तिम समय तक सेवा करते हुए प्रभु के चरणों में विलीन हो गई। अगले दिन अन्तिम यात्रा से पहले  तड़के 4 बजे एक शुभ आगमन भी हुआ, 6 सितम्बर 1969 को सुबह 4 बजे उनके घर मे एक नन्हे बालक की किलकारी गूंजी । उनके पोते दिनेश कुमार खटनावलिया जी का जन्म हुआ,  जो आज दिल्ली पुलिस मे एसीपी के पद पर है ।

अन्तिम यात्रा मे हजारो लोग जुटे । यात्रा पूरे रैगर पुरा, देवनगर, सतनगर से होती हुई प्रसाद नगर पहुंची। जगह जगह लोगो ने उनकी अन्तिम यात्रा रोक कर फूल बरसाये। इनमे सैकड़ो लोग वो थे जिनको जन्म देने वाली पुण्य आत्मा उन्हे छोडकर जा रही थी।

कहते हैं , आदमी के पुण्य कर्मों का फल उनके बच्चों को जरूर मिलता है।  समय के साथ उनके बच्चों की शादी  हुई । एकमात्र बेटी शान्ति जी की शादी रैगर पुरा मे रहने वाले मौर्या परिवार मे हुई ।  उनके बड़े बेटे मनीराम जी के एक पुत्री और 4 पुत्र हुए । प्रकाश चन्द्र जी के दो पुत्र और एक पुत्री हुई ।  बिहारी लाल जी के एक पुत्र हुआ।  धन्नी देवी जी दाई के आर्शिवाद व भगवान की कृपा से आज यह परिवार खुशहाल जिंदगी जी रहा है। कोई बैंक में नौकरी कर रहा है,  कोई अपना व्यापार कर रहा है,  एक दिल्ली पुलिस में एसीपी के पद पर हैं।

जिस संघर्ष से शिखर तक धन्नी देवी जी दाई का परिवार पहुंचा, उससे यही पता चलता है कि विपरीत परिस्थिति मे भी इन्सान को हार नही माननी चाहिये। जीवन की कठिनाईयों के बाद एक नया सवेरा जरूर आता है ।

*ऐसे जज्बे ओर हिम्मत को मेरा बार बार सलाम*

*बेटी शान्ति मौर्या व पुत्र वधू श्रीमति कमला खटनावलिया से बातचीत पर आधारित*

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