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कबीर और कर्मकांड : क्या हम कबीर को समझ पाए हैं?

(29 जून, 2026 - कबीर जयन्ति पर विशेष आलेख)

🙏🌹बाबू लाल बारोलिया, अजमेर️🌹🙏

आज के समय में कबीरदास को प्रायः एक भजन गायक संत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। मंचों पर उनके नाम के दीप जलाए जाते हैं, आरती और हवन होते हैं और फिर गर्व से कहा जाता है—“यह कबीरपंथ है।” परंतु प्रश्न यह है कि क्या कबीर केवल भजन थे? या वे उस सामाजिक–धार्मिक व्यवस्था के सबसे बड़े आलोचक थे, जो जाति, कर्मकांड और अंधविश्वास पर टिकी थी? कबीरदास 15वीं शताब्दी के ऐसे विचारक थे, जिन्होंने न केवल धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास को चुनौती दी, बल्कि ब्राह्मणवाद की वैचारिक नींव पर सीधा प्रहार किया। वे न हिंदू थे, न मुस्लिम—वे मनुष्य थे। उनके लिए ईश्वर मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि मनुष्य के विवेक में था।

इसीलिए भारतीय समाज में कबीरदास का नाम श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उनके दोहे गाए जाते हैं, उनकी जयंतियाँ मनाई जाती हैं और अनेक लोग स्वयं को कबीरपंथी घोषित करते हैं। किंतु यह प्रश्न अनिवार्य हो गया है कि क्या हम कबीर को केवल पूज रहे हैं या वास्तव में समझ भी रहे हैं?

कबीरदास कोई परंपरागत संत नहीं थे। वे अपने समय की सामाजिक–धार्मिक व्यवस्था के सबसे बड़े आलोचक थे। उन्होंने उस ब्राह्मणवादी ढांचे को चुनौती दी, जो जन्म आधारित श्रेष्ठता, कर्मकांड और अंधविश्वास पर टिका था। कबीर के लिए धर्म का अर्थ था—विवेक, आत्मबोध और समानता; न कि पूजा, हवन, आरती और अनुष्ठान।

कबीर का निर्गुण ईश्वर किसी मूर्ति, मंदिर, मजार या अग्निकुंड में सीमित नहीं था। इसी कारण वे स्पष्ट कहते हैं:

मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।”

यह कथन केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि धार्मिक सत्ता के केंद्रीकरण पर सीधा प्रश्न है।विडंबना यह है कि आज कबीर के नाम पर वही कर्मकांड दोहराए जा रहे हैं, जिनका उन्होंने वे जीवन भर विरोध किया। उनके नाम से संगठन और आश्रम बनाकर सत्संगों और भजन संध्याओं में पहले पूजा-पाठ, अंत में आरती और हवन—और बीच में कबीर के दोहे और भजन। यह विरोधाभास गंभीर आत्ममंथन की मांग करता है। क्या कर्मकांड के साथ कबीर संभव हैं?

कबीर का मत स्पष्ट था—

ज्ञान बिना सब पूजा झूठी।”

अर्थात विवेक के बिना किया गया हर धार्मिक आचरण निरर्थक है। कबीर ने जाति व्यवस्था पर भी कठोर प्रहार किया। उनका प्रश्न—

जो तू ब्राह्मण ब्रह्म का बेटा, तो क्यों जन्म द्वार से आया?”

आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि जाति आधारित भेदभाव आज भी समाज की वास्तविकता है।

आज कबीर को देवता बना देना, उन्हें मंदिरों और मंचों तक सीमित कर देना, उनके विचारों को निष्प्रभावी कर देने का आसान तरीका बन गया है। कबीर को क्रांतिकारी विचारक से केवल भजन गायक बना दिया गया है। यह कबीर का सम्मान नहीं, बल्कि उनकी चेतना का क्षरण है।

कबीरपंथ किसी संप्रदाय या परंपरा का नाम नहीं है। यह एक वैचारिक प्रतिरोध है—अंधविश्वास के विरुद्ध, जातिगत श्रेष्ठता के विरुद्ध और शोषणकारी धार्मिक संरचनाओं के विरुद्ध। जो व्यक्ति कर्मकांड, मूर्तिपूजा और जातीय अहंकार को बनाए रखता है, वह कबीर को उद्धृत कर सकता है, लेकिन कबीर का अनुयायी नहीं हो सकता।

कबीर और आंबेडकर : एक ही चेतना

कबीर ने जो बात पंद्रहवीं शताब्दी में कही, डॉ. आंबेडकर ने उसे संविधान में अधिकार बनाया। दोनों का लक्ष्य एक था—

समानता – विवेक – सामाजिक न्याय -मानव गरिमा – कबीर कविता थे,

आंबेडकर संविधान।

कबीर और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों में गहरी संगति दिखाई देती है।  दोनों ने ब्राह्मणवाद को सामाजिक असमानता की जड़ माना।

आज जब धर्म के नाम पर नफरत फैल रही है, जाति समाज को बाँट रही है और कर्मकांड विवेक को कुंद कर रहे हैं, तब कबीर पहले से अधिक प्रासंगिक हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति मंदिर में नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने में है।

कबीर स्वयं कहते हैं—

कबीर खड़ा बाज़ार में, लिए लुकाठी हाथ,

      जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ।”

आज आवश्यकता है उस साहस की, जो अंधविश्वास, जाति और पाखंड रूपी घर को जला सके।

कबीर भजन नहीं, चेतना हैं—और चेतना ही समाज को आगे बढ़ाती है।

प्रश्न केवल यह नहीं है कि हम कबीर को कितना पूजते हैं,

प्रश्न यह है कि हम कबीर को कितना जीते हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer): “ये लेखक के निजी विचार हैं। इनसे समाजहित एक्सप्रेस का सहमत होना आवश्यक नहीं है।”

 

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