सामाजिक विवाह सम्मेलन को राजनीति का मंच नहीं, समाज सुधार का आंदोलन बनाइए

🙏🌹 बाबू लाल बारोलिया, अजमेर 🌹🙏
भारत के सामाजिक विवाह सम्मेलन कोई राजनीतिक रैली नहीं हैं, ये सामाजिक क्रांति के मंच हैं!
19वीं सदी के सुधार आंदोलनों से शुरू होकर 21वीं सदी में सरकारी योजनाओं के रूप में विकसित ये सम्मेलन गरीबों की बेटियों, विधवाओं और तलाकशुदा बहनों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए बने थे। इनका उद्देश्य था — दहेज के बोझ से मुक्त विवाह, अनावश्यक खर्चों पर लगाम, सामाजिक समरसता और सादगी की मिसाल कायम करना। ये आयोजन समाज को जोड़ने, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सम्मान देने और रूढ़िवादी बंधनों को तोड़ने का माध्यम बने।
सामूहिक विवाह सम्मेलन केवल विवाह कराने का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह समाज सुधार, सामाजिक समरसता और आर्थिक समानता का एक पवित्र अभियान है। इसकी शुरुआत उन गरीब, मजदूर, दलित, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की सहायता के लिए हुई थी, जिनके लिए बेटियों का विवाह भारी आर्थिक बोझ बन जाता था। इसका उद्देश्य दहेज प्रथा, दिखावा, फिजूलखर्ची और सामाजिक भेदभाव जैसी कुरीतियों पर प्रहार करना था।
लेकिन अफसोस कि आज क्या हो रहा है?
आज दुख और चिंता का विषय है कि अनेक सामाजिक विवाह सम्मेलन अपने मूल उद्देश्य से भटकते जा रहे हैं। जहां एक ओर विवाह की पवित्र रस्में औपचारिकता बनकर रह गई हैं, वहीं दूसरी ओर मंचों पर राजनीतिक नेताओं, मंत्रियों और दलों के प्रतिनिधियों का महिमामंडन शुरू हो जाता है। समाज सुधार की चर्चा कम और राजनीतिक भाषण अधिक होने लगे हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो सामाजिक सम्मेलन नहीं, बल्कि वोट बैंक की प्रयोगशाला चल रही हो।
यह प्रवृत्ति अत्यंत घातक है। समाज को गंभीरता से समझना होगा कि जब सामाजिक मंच राजनीति के कब्जे में चले जाते हैं, तब वहां से समाजहित धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
आखिर क्यों खतरनाक है सामाजिक सम्मेलनों का राजनीतिकरण?
- मूल उद्देश्य की हत्या
जिस सम्मेलन का उद्देश्य गरीब परिवारों की सहायता, सादगीपूर्ण विवाह और सामाजिक सुधार था, वह यदि राजनीतिक प्रचार का माध्यम बन जाए तो उसका अस्तित्व ही खत्म हो जाता है। जरूरतमंद परिवार पीछे छूट जाते हैं और मंच पर केवल राजनीतिक चमक दिखाई देती है।
- समाज में विभाजन पैदा होता है
राजनीति का स्वभाव ही पक्ष और विपक्ष में बांटना है। जब राजनीतिक दल सामाजिक मंचों पर हावी होते हैं तो समाज भी गुटों में बंटने लगता है। सामाजिक एकता कमजोर होती है और आपसी भाईचारा प्रभावित होता है।
- सेवा की भावना खत्म होकर स्वार्थ हावी हो जाता है
जहां समाज सेवा होनी चाहिए वहां फोटो सेशन, माला,साफा, शॉल, पहनाने, बड़े बड़े आलीशान मोमेंट भेंट करने और भाषणबाजी की होड़ लग जाती है। समाज के नाम पर प्रचार करने वाले लोग सामाजिक भावना को कमजोर करते हैं।
- सादगी समाप्त, दिखावा शुरू
सामूहिक विवाह सम्मेलन का मूल आधार सादगी है। लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप से मंच सजावट, बैनर, पोस्टर, शक्ति प्रदर्शन और भीड़ जुटाने की प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। इससे सम्मेलन का पवित्र उद्देश्य धूमिल हो जाता है।
समाज को अब जागना होगा
आयोजकों को सम्मेलन आयोजित करने से यह सोचना होगा कि सामाजिक विवाह सम्मेलन किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं हैं। यह समाज की सामूहिक चेतना और सहयोग का प्रतीक हैं। यदि कोई जनप्रतिनिधि या राजनीतिक व्यक्ति समाजहित में सहयोग करना चाहता है तो उसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन बिना राजनीतिक भाषण, बिना प्रचार और बिना वोट मांगने की मानसिकता के।
समाज को यह तय करना होगा कि मंच पर समाज सुधार की बात होगी या राजनीतिक स्वार्थ की?
आज आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक संगठन साहस दिखाएं और स्पष्ट नीति बनाएं कि सामूहिक विवाह सम्मेलन केवल समाज सेवा, सामाजिक सुधार और मानवीय मूल्यों के लिए होंगे — राजनीति के लिए नहीं।
याद रखिए…
जब समाज के मंच राजनीति के कब्जे में चले जाते हैं, तब समाज का असली मुद्दा पीछे छूट जाता है।और जब समाज अपने सामाजिक आयोजनों की पवित्रता बचा लेता है, तभी वास्तविक सामाजिक परिवर्तन संभव होता है।
आइए संकल्प लें —
सामूहिक विवाह सम्मेलन को दिखावे, प्रचार और राजनीतिक अखाड़े से मुक्त रखेंगे।
सामाजिक विवाह सम्मेलन के मूल उद्देश्य को समाज सुधार, सामाजिक एकता, सादगी और मानवता का महाअभियान बनाएंगे।



